Manushyata Class 10 Hindi animated explanation and summary
- Utkarsh Chowdhary
- Jan 29, 2021
- 5 min read
Updated: May 5, 2023
'मनुष्यता' कविता में कवि मैथिलीशरण गुप्त मनुष्य को मनुष्यता का भाव अपनाने के लिए कहते हैं। उनके अनुसार आज का मनुष्य अपने स्वार्थों की पूर्ति हेतु लोकहित जैसी भावना को भूलता जा रहा है। जो मनुष्य अपने लिए जीता है, वह पृथ्वी में पशु के समान है। क्योंकि पशु के जीवन का उद्देश्य खाना और सोना होता है। भगवान ने मनुष्य को सामर्थ्यवान बनाया है। मनुष्य दूसरों की सेवा करने के स्थान पर पूरा जीवन स्वयं का भरण-पोषण करने में व्यर्थ करता है, तो वह मनुष्य कहलाने लायक नहीं है। कवि कर्ण, दधीचि ऋषि, रंतिदेव, राजा उशीनर आदि महानुभूतियों का उदाहरण देकर मनुष्य को लोकहित के लिए प्रेरित करते हैं। वह कहते हैं, जो मनुष्य इस संसार में दूसरों की सेवाभाव में अपना जीवन समर्पित करते हैं, वे इस संसार के द्वारा ही नहीं अपितु भगवान के द्वारा भी पूज्यनीय होते हैं। वह अपने कार्यों से समाज में अन्य लोगों को लोकहित और सेवा का मार्ग दिखाते हुए चलते हैं। ऐसे व्यक्ति समाज में मिसाल कायम करते हैं। युगों-युगों तक उनकी गाथा गायी जाती है। अत: मनुष्य को अपने गुणों का विकास करते हुए, पूरा जीवन लोकहित में अर्पण कर देना चाहिए।
प्रश्न १) मनुष्य मात्र बंधु है से क्या तात्पर्य है?
उत्तर) सभी मनुष्य एक दूसरे के मित्र और बंधु हैं और सब के माता - पिता ईश्वर हैं। कोई भी काम बड़ा या छोटा केवल बाहर से हीं प्रतीत होता है।
प्रश्न २) कविता एवं कवि का नाम लिखिए?
उ०) इस कविता का नाम है 'मनुष्यता' और इसके कवि हैं 'मैथलीशरण गुप्त'।
प्रश्न ३) सुमृत्यु किसे कहते हैं?
उ०) मानव जीवन तभी सार्थक होता है जब वह दूसरों के काम आये और ऐसे इंसान की मृत्यु को सुमृत्यु माना जाता है जो मानवता की राह में परोपकार करते हुए आती है । ऐसे मनुष्य को लोग उसकी मृत्यु के पश्चात भी श्रद्धा से याद करते हैं ।
प्रश्न ४) महापुरुषों जैसे कर्ण, दधीचि, सीबी ने मनुष्यता को क्या सन्देश दिया है इस कविता में?
उ०) विरासत में मिली चीज़ें हमें हमारे पूर्वज की, पूर्व अनुभवों की और पुरानी परम्पराओं की याद दिलाती है | नई पीढ़ी उनके बारे में जाने, उनके अनुभव से कुछ सीखे और उनके द्वारा बनाई हुई श्रेष्ठ परम्पराओं का पालन करें इसी उद्देश्य से विरासत में मिली चीज़ों को संभालकर रखा जाता है।
प्रश्न ५) किन पंक्तियों से पता चलता है ही हमें गर्व रहित जीवन जीना चाहिए?
उ०) रहो न भूल के कभी मदांध तुच्छ वित्त में, सनाथ जान आपको करो न गर्व चित्त में।
प्रश्न ६) अनंत अंतरिक्ष में अनंत देव हैं खड़े, समक्ष ही स्वबाहु जो बढ़ा रहे बड़े-बड़े।परस्परावलंब से उठो तथा बढ़ो सभी।
उत्तर) जिस तरह से ब्रह्माण्ड में अनंत देवी देवता जनहित के लिए एक दूसरे के साथ परस्पर एकसाथ काम करते हैं, उसी तरह इंसान को भी आपसी भाईचारे से काम करना चाहिए। ऐसा नहीं होना चाहिए कि किसी से किसी और का काम न चले, बल्कि सभी एक दूसरे के काम आएँ।
प्रश्न ७) यह कविता व्यक्ति को किस प्रकार जीवन जीने की प्रेरणा देता है?
उत्तर) हमें दूसरों के लिए कुछ ऐसे काम करने चाहिए कि मरने के बाद भी लोग हमें याद रखें। इंसान को आपसी भाईचारे से काम करना चाहिए। मानव जीवन तभी सार्थक होता है जब वह दूसरों के काम आए ऐसा नहीं होना चाहिए कि किसी से किसी और का काम न चले।
प्रश्न ८) चलो अभीष्ट मार्ग में सहर्ष खेलते हुए,
विपत्ति, विघ्न जो पड़ें उन्हें ढ़केलते हुए
घटे न हेलमेल हाँ, बढ़े न भिन्नता कभी ।
उ०) हमें अपने लक्ष्य की ओर हँसते हुए और रास्ते की बाधाओं को हटाते हुए चलते रहना चाहिए। जो रास्ता आपने चुना है उसपर बिना किसी बहस के पूरी निष्ठा से चलना चाहिए। इसमें भेदभाव बढ़ने की कोई जगह नहीं होनी चाहिए, बल्कि भाईचारा जितना बढ़े उतना ही अच्छा है। वही समर्थ है जो खुद तो पार हो ही और दूसरों की नैया को भी पार लगाए।
प्रश्न ९) अनाथ कौन है यहाँ? त्रिलोकनाथ साथ हैं,दयालु दीनबंधु के बड़े विशाल हाथ हैं।
अतीव भाग्यहीन है अधीर भाव जो करे ,वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे ।
उ०) यहाँ पर कोई भी अनाथ नहीं है सब सनाथ हैं । भगवान के हाथ इतने बड़े हैं कि उनका हाथ सब के सिर पर होता है। इसलिए यह सोचकर कभी भी घमंड नहीं करना चाहिए कि तुम्हारे पास बहुत संपत्ति या यश है। ऐसा अधीर व्यक्ति बहुत बड़ा भाग्यहीन होता है।
प्रश्न १०) इस कविता का क्या सन्देश है?
उत्तर) इस कविता के माध्यम से कवि हमें मानवता, सद्भावना, भाईचारा उदारता, करुणा और एकता का सन्देश देते हैं। कवि कहना चाहते हैं की हर मनुष्य पूरे संसार में अपनेपन की अनुभूति करें ।वह जरूरतमंदों के लिए बड़े से बड़ा त्याग करने में भी पीछे न हटे। उनके लिए करुणा का भाव जगाये | वह अभिमान, अधीरता और लालच का त्याग करें। एक दूसरे का साथ देकर देवत्व को प्राप्त करें | वह सुख का जीवन जिए और मेलजोल बढ़ाने का प्रयास करें । कवि ने प्रेरणा लेने के लिए रतिदेव, क्षितीश, कर्ण और कई महानुभावों के उदाहरण दे कर उनके अतुल्य त्याग के बारे में बताया है ।
हुई न यों सुमृत्यु तो वृथा मरे, वृथा जिए,वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे?
उ०) उस आदमी का जीवन अर्थहीन है जो अपने स्वार्थ के लिए जीता है। जिस तरह से पशु सिर्फ अपने जीवन यापन के लिए कार्य करता है, मनुष्य का जीवन वैसा नहीं होना चाहिए। ऐसा जीवन जीने वाले कब जीते हैं और कब मरते हैं कोई ध्यान ही नहीं देता है। हमें दूसरों के लिए कुछ ऐसे काम करने चाहिए कि मरने के बाद भी लोग हमें याद रखें। साथ में हमें ये भी अहसास होना चाहिए कि हम अमर नहीं हैं।
प्रश्न १२)उसी उदार की कथा सरस्वती बखानती,उसी उदार को धरा कृतार्थ भाव मानती
उ०) जो आदमी पूरे संसार में आत्मीयता और भाईचारा का संचार करता है उसी उदार व्यक्ति की कीर्ति युगों तक गूँजती है। धरती भी सदैव उसकी आभारी रहती है। समस्त सृष्टि ऐसे व्यक्ति की पूजा करती है और सरस्वती भी उसका बखान करना नहीं भूलती है।
प्रश्न १३)क्षुधार्त रतिदेव ने दिया करस्थ थाल भी, तथा दधीचि ने दिया परार्थ अस्थिजाल भी।
उशीनर क्षितीश ने स्वमांस दान भी किया,सहर्ष वीर कर्ण ने शरीर चर्म भी दिया।
उत्तर) पौराणिक गाथाओं में हमें कई दानवीरों की कहानियाँ मिलती हैं। जिन्होंने दूसरों के हित के लिए अपना सर्वस्व दान कर दिया। रतिदेव ने अपने हाथ की अंतिम थाली भी दान में दे दी थी। दधिची ने वज्र बनाने के लिए अपनी हड्डी देवताओं को दान दे दी थी जिससे सबका उद्धार हो पाया। सिबि ने कबूतर की जान बचाने के लिए बहेलिए को अपने शरीर का मांस दे दिया। ऐसे बहुत से महापुरुष इस दुनिया में पैदा हुए हैं जिनके परोपकार के कारण आज भी लोग उन्हें याद करते हैं।
प्रश्न १४)सहानुभूति चाहिए, महाविभूति है यही,
वशीकृता सदैव है बनी हुई स्वयं मही।
विरुद्धवाद बुद्ध का दया प्रवाह में बहा|
उत्तर) पूरी दुनिया पर उपकार करने की इच्छा ही सबसे बड़ा धन होता है। ईश्वर भी ऐसे लोगों के वश में एवं साथ हो जाते हैं। जब भगवान बुद्ध से लोगों का दर्द नहीं सहा गया तो वे दुनिया के नियमों के विरुद्ध चले गए उनका ऐसा करना लोगों की भलाई के लिए था, इसलिए आज भी लोग उन्हें पूजते हैं।
प्रश्न १५) 'मनुष्य मात्र बंधु है’ यही बड़ा विवेक है,
पुराणपुरुष स्वयंभू पिता प्रसिद्ध एक है|
फलानुसार कर्म के अवश्य वाह्य भेद हैं,
परंतु अंतरैक्य में प्रमाणभूत वेद हैं
अनर्थ है कि बंधु ही न बंधु की व्यथा हरे |
उत्तर) सभी मनुष्य एक दूसरे के मित्र और बंधु हैं और सब के माता-पिता ईश्वर हैं। कोई काम बड़ा या छोटा ऐसा केवल बाहर से प्रतीत होता है। अंदर से अभी एक समान हैं। इसलिए कर्म के आधार पर किसी को बड़ा या छोटा नहीं समझना चाहिए। एक भाई अगर अपने दूसरे भाई की पीड़ा ना हरे तो मानव जीवन व्यर्थ है। ये पंक्तियाँ, हमारी बनायीं हुई जाति व्यवस्था की तरफ उँगली उठाती हैं। जिस कारण हमने लोगों को उनकी जाति, रंग और कुल- गोत्र से बाँध रखा है ।
प्रश्न १६) कविता का प्रतिपाद्य लिखिए।
उ०) यह पूरी कविता सहोपकारिता और परोपकारिता का उपदेश देती है। जीवन के हर परिप्रेक्ष्य में हम एक दूसरे के सहयोग पर निर्भर करते हैं। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और पूरा मानव समाज इसी सहयोग पर आधारित है। जो दूसरे की भलाई में जीवन लगाता है, उसे आने वाली पीढ़ियाँ हमेशा याद रखती हैं।
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